मुख्य बातें
- प्राकृतिक खेती में बाज़ार से रासायनिक खाद और कीटनाशक नहीं खरीदे जाते; खेत और देसी गाय से बने घोल इस्तेमाल होते हैं।
- इसके चार स्तंभ हैं: बीजामृत, जीवामृत, आच्छादन (मल्चिंग) और वाफसा।
- पूरे खेत को एक साथ न बदलें — पहले साल एक छोटे हिस्से से शुरुआत करें।
प्राकृतिक खेती ऐसी खेती है जिसमें रासायनिक खाद और ज़हरीले कीटनाशकों की जगह खेत में ही उपलब्ध चीज़ें — देसी गाय का गोबर, गोमूत्र, फसल के अवशेष और स्थानीय पौधे — इस्तेमाल किए जाते हैं। इसका मकसद मिट्टी में रहने वाले सूक्ष्मजीवों और केंचुओं को फिर से सक्रिय करना है, ताकि मिट्टी खुद पौधों को पोषण दे सके।
सरकार इसे “भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति” के नाम से बढ़ावा दे रही है। नवंबर 2024 में केंद्र सरकार ने इसके लिए राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन को मंज़ूरी दी।
प्राकृतिक खेती के चार स्तंभ
नीति आयोग के प्राकृतिक खेती पोर्टल और NIOS की पाठ्य सामग्री के अनुसार प्राकृतिक खेती चार मुख्य स्तंभों पर टिकी है:
- बीजामृत — बुवाई से पहले बीज का उपचार, ताकि बीज और जड़ें मिट्टी के रोगों से बची रहें। बीजामृत बनाने की विधि पढ़ें।
- जीवामृत — गोबर, गोमूत्र, गुड़ और बेसन से बना घोल, जो मिट्टी में लाभदायक सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ाता है। जीवामृत बनाने की विधि पढ़ें।
- आच्छादन (मल्चिंग) — मिट्टी को फसल अवशेष, पुआल या जीवित फसलों से ढककर रखना। इससे नमी बचती है, मिट्टी का तापमान संतुलित रहता है, कटाव रुकता है और खरपतवार कम उगते हैं।
- वाफसा — मिट्टी के कणों के बीच हवा और नमी का संतुलन। प्राकृतिक खेती में पौधों को “डुबोकर” पानी देने के बजाय इतना पानी दिया जाता है कि मिट्टी में हवा और नमी दोनों बनी रहें।
प्राकृतिक खेती और जैविक खेती में अंतर
| बात | प्राकृतिक खेती | जैविक खेती |
|---|---|---|
| खाद | खेत पर बने घोल (जीवामृत, घनजीवामृत) | वर्मीकम्पोस्ट, जैविक खाद — अक्सर बाहर से खरीदी जाती है |
| लागत | बहुत कम, ज़्यादातर सामग्री खेत पर ही | जैविक उत्पाद खरीदने से लागत बढ़ सकती है |
| प्रमाणन | सरकार सरल प्रमाणन व्यवस्था बना रही है | अलग प्रमाणन व्यवस्था (जैसे PGS-India, NPOP) |
पहले साल शुरुआत कैसे करें
- छोटा हिस्सा चुनें — एक बीघा या खेत का दसवां हिस्सा। बाकी खेत में अपनी पुरानी पद्धति जारी रखें।
- देसी गाय की व्यवस्था करें — गोबर और गोमूत्र की ज़रूरत होगी। एक गाय से कई एकड़ के लिए जीवामृत बन सकता है।
- बीजामृत से बीज उपचार करें और बुवाई के बाद हर 15 दिन में जीवामृत दें।
- खेत को खाली न छोड़ें — फसल अवशेष न जलाएं, उन्हें मल्चिंग में इस्तेमाल करें।
- हिसाब रखें — लागत, उपज और मिट्टी में बदलाव लिखते रहें। यही आपका असली सबूत होगा।
सावधानी: रासायनिक खेती से प्राकृतिक खेती में बदलने पर कई किसानों को पहले एक-दो सीज़न में उपज में कमी दिखती है, जब तक मिट्टी की जैविक गतिविधि वापस नहीं आती। इसीलिए छोटे हिस्से से शुरुआत करें और नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से सलाह लेते रहें।
किसानों के सवाल
क्या प्राकृतिक खेती में उपज कम हो जाती है?
बदलाव के शुरुआती समय में कुछ फसलों में उपज कम हो सकती है। मिट्टी सुधरने के साथ उपज स्थिर होती है, जबकि लागत काफी घट जाती है। परिणाम मिट्टी, फसल और देखभाल पर निर्भर करते हैं।
क्या बिना गाय के प्राकृतिक खेती हो सकती है?
जीवामृत और बीजामृत के लिए देसी गाय का गोबर और गोमूत्र चाहिए। अपनी गाय न हो तो पड़ोसी किसान, गौशाला या सरकार के बायो-इनपुट रिसोर्स सेंटर से मदद ली जा सकती है।
प्राकृतिक खेती की ट्रेनिंग कहां मिलेगी?
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और कृषि सखियों के ज़रिए प्रशिक्षण दिया जा रहा है। अपने ज़िले के KVK या कृषि विभाग से पूछें।
स्रोत: नीति आयोग — प्राकृतिक खेती के घटक; NIOS, भारतीय ज्ञान परंपरा व्यावसायिक कौशल (स्तर C, अध्याय 11); प्रधानमंत्री कार्यालय — राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन (25 नवंबर 2024)।
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