आपकी यूरिया का दो-तिहाई हिस्सा फसल तक नहीं पहुंचता: किसान क्या करें ?

भारत में डाली गई यूरिया का सिर्फ 30–35% हिस्सा फसल ले पाती है। बाकी हवा और भूजल में जाता है। जानिए ढैंचा, दलहन, सही सिंचाई और मुफ्त जल जांच से पैसा और पानी कैसे बचाएं।

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यूरिया की 3 बोरी में से सिर्फ 1 का नाइट्रोजन फसल तक पहुंचता है

किसान भाईयों, मान लीजिए आप खेत में यूरिया की 3 बोरियां डालते हैं। अनुमान बताते हैं कि इनमें से लगभग एक बोरी का नाइट्रोजन ही फसल तक पहुंचता है। बाकी दो बोरियों का नाइट्रोजन हवा में उड़ जाता है या पानी के साथ नीचे उतरकर आपके ही गांव के भूजल तक पहुंच जाता है। यह आपके पैसे की बर्बादी भी है और इससे पीने के पानी का दूषित होने का खतरा भी बढ गया हैं।

यूरिया से मिलने वाला नाइट्रोजन कहां जाता है?

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार भारत में अनाज की फसलें, डाले गए नाइट्रोजन का सिर्फ 30–35% हिस्सा ले पाती हैं। राष्ट्रीय स्तर की सहकारी संस्था KRIBHCO ( कृषक भारती कॉपरेटिव लिमिटेड) जो उर्वरक उत्पादन एवं वितरण का कार्य करती है, के अनुसार धान में यह मात्रा लगभग 30% और गेहूं में लगभग 50% है।

बाकी बचा हुआ नाइट्रोजन तीन तरीके से निकल जाता है:

  1. हवा में उड़ना (अमोनिया गैस): भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) के वैज्ञानिकों के अनुसार 8–10% नाइट्रोजन इसी तरह उड़ जाता है। क्षारीय मिट्टी और तेज धूप में यह नुकसान ज्यादा होता है।
  2. नीचे रिसना (लीचिंग): यूरिया मिट्टी में बदलकर नाइट्रेट बनता है। नाइट्रेट मिट्टी से चिपकता नहीं और ज्यादा सिंचाई के पानी के साथ नीचे भूजल तक चला जाता है।
  3. गैस बनकर नुकसान: पानी भरे खेतों में नाइट्रोजन गैस बनकर निकल जाता है।

दूसरा पहलू: दूषित भूजल

आइये, अब ज्यादा मात्रा में यूरिया उपयोग का दूसरा पहलू समझते हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड (CGWB) की 2024 की रिपोर्ट बताती है:

  • देश भर में लगभग 20% भूजल नमूनों में नाइट्रेट पीने के पानी की सुरक्षित सीमा (45 मिलीग्राम/लीटर) से ज्यादा था।
  • प्रभावित जिले 2017 में 359 थे, जो बढ़कर 440 हो गए।
  • राजस्थान में 630 में से 312 नमूने (लगभग 50%) सीमा से अधिक मिले।
  • रिपोर्ट के अनुसार ज्यादा सिंचाई खाद के नाइट्रेट को गहराई तक धकेल सकती है।

राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश में नाइट्रेट का स्तर 2015 से लगभग एक जैसा है। ज्यादा नाइट्रेट वाला पानी छोटे शिशुओं में “ब्लू बेबी सिंड्रोम” का खतरा बढ़ाता है, जिसमें खून की ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता घटती है। पानी उबालने से नाइट्रेट खत्म नहीं होता।

सरकार के प्रयास : नीम लेपित यूरिया

2015 से देश में बनने और आयात होने वाली सारी यूरिया का नीम लेपित होना अनिवार्य है। नीम की परत नाइट्रोजन को धीरे-धीरे छोड़ती है, जिससे नुकसान कम होता है। साथ ही 50 किलो की जगह 45 किलो की बोरी आई, ताकि खपत घटे। पर विशेषज्ञ साफ कहते हैं कि नीम लेपित यूरिया पूरा समाधान नहीं है। जरूरत से ज्यादा डाली गई यूरिया अब भी नुकसान करती है।

किसान के हाथ में 6 सबसे असरदार उपाय

किसान भाइयों, अपने खेत में खड़ी फसल के स्वास्थ्य के साथ ही देश के नागरिक़ों के स्वास्थ्य और इस धरती माता के स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी हमारी जिम्मेदारी हैं। खाद, उर्वरक व अन्य कृषि आदानों का सही मात्रा में विवेकपूर्ण उपयोग करके हम सबका ध्यान रख सकते हैं। इसके लिये आपको ये उपाय/कार्य करने होंगे-

1. अंदाजे से नहीं, मिट्टी जांच से खाद

स्थानीय कृषि विभाग से सम्पर्क करें और अपने खेत का मृदा स्वास्थ्य कार्ड बनवाएं। कई खेतों में जितनी यूरिया डाली जाती है, उतनी जरूरत ही नहीं होती। मृदा स्वास्थ्य कार्ड में आपक़ों फसल को जरूरत और मिंट्टी में पोषक तत्वों की मांग के आधार पर आपको मात्रा बताई जाती है जिसका प्रयोग करके आप फसल – मांग का और मृदा स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए अधिकतम उत्पादन ले सकते हैं।

2. एक बार में नहीं, किस्तों में

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, फसल में नाइट्रोजन की कुल मात्रा को 2–3 हिस्सों में, फसल की मांग के अनुसार अलग-अलग अवस्थाओं में देना चाहिये । अधिकांश फसलों में 50 प्रतिशत मात्रा बुवाई के समय और शेष 50 प्रतिशत को दो भागों में करके खड़ी फसल में देना चाहिये I तेज धूप की जगह सुबह-शाम डालें और हल्की सिंचाई के साथ मिट्टी में मिलाएं।

3. ढैंचा: खेत में उगने वाली यूरिया

ढैंचा एक महत्वपूर्ण हरी खाद वाली फसल है, जो मिट्टी में जैविक पदार्थ एवं नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ाकर उसकी उर्वरता सुधारती है। इसकी बुवाई के लगभग 45–50 दिनों बाद मिट्टी में पलटने से भूमि की संरचना, जलधारण क्षमता और सूक्ष्मजीव गतिविधियाँ बेहतर होती हैं। यह रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर टिकाऊ एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देती है। ICAR के मोतिहारी संस्थान ने जून 2026 में किसानों को बताया:

  • अच्छी ढैंचा फसल लगभग 50–60 किलो नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर जोड़ती है। यह लगभग 2.5–3 बोरी यूरिया के बराबर है।
  • धान में यह फसल की नाइट्रोजन जरूरत का 25–40% तक पूरा कर सकती है।
  • बुवाई के 40–45 दिन बाद इसे खेत में जोत दें।

4. दलहनी फसलें फसल चक्र में रखें

फसल चक्र में दलहनी फसलों को अवश्य शामिल करें। मूंग, उड़द, चना, मटर और मसूर जैसी दलहनी फसलों की जड़ों में उपस्थित राइजोबियम जीवाणु वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण कर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करते हैं। दलहनी फसलों को फसल चक्र में अपनाने से मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरता है, कीट एवं रोगों का प्रकोप कम करने में सहायता मिलती है तथा रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटती है। इससे खेती की लागत कम करने और टिकाऊ कृषि उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलती है।

5. जीवामृत और घनजीवामृत से बनाय़ें मिट्टी को जीवन्त

जीवामृत और घनजीवामृत प्राकृतिक खेती में उपयोग किए जाने वाले जैविक घोल एवं ठोस मिश्रण हैं, जो मिट्टी में लाभकारी सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को बढ़ावा देने में मदद करते हैं। इनके प्रयोग से जैविक पदार्थों के अपघटन और पौधों को पोषक तत्वों की उपलब्धता में सुधार हो सकता है। नियमित रूप से जैविक पदार्थों के साथ इनका संतुलित उपयोग मिट्टी के स्वास्थ्य, उर्वरता और टिकाऊ कृषि उत्पादन को बढ़ावा देने में सहायक हो सकता है।

6. जरूरत से ज्यादा सिंचाई न करें

जरूरत से ज्यादा सिंचाई न करें, मिट्टी की सेहत और पानी दोनों बचाएं। फालतू पानी नाइट्रेट को नीचे ले जाता है। फसलों में आवश्यकता से अधिक सिंचाई करने से मिट्टी में जलभराव, पोषक तत्वों का रिसाव और जड़ों को ऑक्सीजन की कमी जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इससे पौधों की वृद्धि और उत्पादन प्रभावित होता है। फसल की अवस्था, मिट्टी की नमी और मौसम के अनुसार संतुलित सिंचाई करें। ड्रिप एवं स्प्रिंकलर तथा मल्चिंग जैसी आधुनिक सिंचाई तकनीकों को अपनाकर जल संरक्षण, मिट्टी की उर्वरता और खेती की उत्पादकता बनाए रखने में मदद मिलती है।

अपने पीने के पानी की जांच कैसे कराएं?

जल जीवन मिशन के तहत गांव-स्तर पर जांच की व्यवस्था है:

  • फील्ड टेस्ट किट (FTK): हर गांव में 5 महिलाओं को पानी जांचने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। यह किट नाइट्रेट समेत 9 चीजों की जांच करती है। अपनी ग्राम पंचायत या पानी समिति (VWSC) से पूछें।
  • सरकारी जल परीक्षण प्रयोगशाला: देश में 2,000 से ज्यादा प्रयोगशालाएं आम लोगों के लिए खुली हैं और कम शुल्क लेती हैं। अपने जिले के PHED कार्यालय से पता करें।
  • जांच के नतीजे सरकार के WQMIS पोर्टल पर दर्ज होते हैं।

अगर नाइट्रेट ज्यादा निकले तो छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए सुरक्षित स्रोत का पानी इस्तेमाल करें। RO जैसे फिल्टर नाइट्रेट कम करते हैं, साधारण कपड़े वाले फिल्टर नहीं।

सार: एक तीर से दो निशाने

यूरिया का सही इस्तेमाल और ढैंचा-दलहन जैसे प्राकृतिक नाइट्रोजन स्रोत आपकी जेब का पैसा भी बचाते हैं और गांव का पानी भी। इस सीजन एक खेत में मिट्टी जांच के आधार पर यूरिया डालें और अगली खरीफ से पहले ढैंचा आजमाएं।

और पढ़ें: मिट्टी और पानी · राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन


स्रोत

  • ढैंचा
  • नाइट्रेट
  • नीम लेपित यूरिया
  • पानी की जांच
  • यूरिया

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यह जानकारी सामान्य मार्गदर्शन के लिए है। अपनी मिट्टी, फसल और मौसम के अनुसार नज़दीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) से सलाह ज़रूर लें। किसान कॉल सेंटर: 1800-180-1551

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